बातों-बातों मे…. हत्या और राजनीति

शंकालू – मुंशीजी, देष में बलात्कार और हत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण क्या हैं?
मंुशीजी – शंकालू, कारण एक नहीं अनेक है। समाज में भौतिक सुखों की अंधी दौड़ और धर्म तथा आस्था के नाम पर बढ़ता पाखण्ड इसका मुख्य कारण है। अगर समत्वबुद्धि तथा विवेष से भौतिकता की मीमांसा की जाये तो भौतिकता बुरी नहीं हैै। यह भी हमारे जीवन का अंग है। समस्या इसलिए पैदा हुई कि बहुतायत समाज ने भौतिकता को ही सम्पूर्ण जीवन मान लिया है। इसलिए आध्यत्मिकता को तिलांजलि देकर वह उस अंधी दिषाहीन प्रक्रिया से जुड़ गया है जिसमें तृप्ति कभी नहीं मिलती। इसके अलावा घटिया स्वास्र्थों की पूर्ति के लिए मानव आज धर्म और आस्था का इस्तेमाल ढाल के रूप करनें लगा है। अपने कुकृत्यों में फंस जाने पर मानव बचाव के लिए धर्म और आस्था का इस्तेमाल करता है। दोनों ही परिस्थितियों में समाज में असहनषीलता और विद्वेष पनता है और मानव अपना दुष्मन खुद बन कर ऐसे कुकृत्य करता है जो पूरे समाज में अषांति का कारण है।

शंकालू – मुंषीजी, केन्द्र और राज्यों की सरकारें स्थिति पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पाती है?
मुंशीजी – शंकालू, तुम्हारा यह प्रष्न अपने आप में ज्वलंत है। पिछले सात दषकों के दौरान हमारे देष में राजनीतिक व्यवस्था ने जो यात्रा की है उसमें इसका स्वरूप निखरने के बजाय विदूष हुआ है। दलगत राजनीति की कुत्सित भावना ने व्यवस्था का विषकरण कर दिया। आज की आरजकता के लिए मुख्य रूप से दलगत राजनीति का सत्तालोलुप्ता स्वरूप ही संचालित होती है। राजनीतिक लाभ के लिए नेता अपने प्रतिद्वन्द्वी की हत्या कराने में नहीं हिचकते हैं। जब राजनीति ही हत्या और अपराध की संरक्षक होगी तो समाज कहां से शंातिमूलक रह पायेगा।

शंकालू – मुंषीजी, हत्या बलात्कार और अराजकता के लिए दलगत राजनीति की भूमिका को ज़रा स्पष्ट करें?
मुंशीजी – शंकालू, नेहरू और शास्त्रीजी के समय तक राजनीति में हत्या और व्याभिचार का समावेष नहीं हुआ था। लेकिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से राजनीतिक हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया। कई बडे़ नेताओं की संदिग्ध मौतें हुई। बिहार में ललित नारायण मिश्रा बम विस्फोट में मारे गए। पीछे सत्ता का परोक्ष हाथ था। इंदिरा जी के मामने में राजनीति में अपराधीकरण का दौर शुरू हो गया था। उनके लम्बे शासनकाल में अच्छे कार्यों के साथ गलत कार्य भी हुए। आपातकाल लगाना इंदिरा जी की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी। हालांकि विपक्ष एक बार एकजुट होने के बावजूद ढ़ाई साल में बिखर गया और इंदिरा गांधी की पुनःवापसी हो गई। शंकालू, किस्मत का खेल देखो कि इंदिरा जी का अंत भी हत्या से हुआ। यही नहीं राजीव गांधी भी हत्या के षिकार हुआ। इससे ये प्रमाणित हो गया कि जो जैसा बोता है, वही काटता है।

शंकालू – मुंषीजी, राजनीतिक अपराधीकरण के षिकार अन्य दल कैसे हुए?
मुंशीजी – शंकालू, जिन गुंडों और बाहुबलियों के सहारे कांग्रेस चुनाव जीतती रही, उनके मठाधीषों ने सोचा कि हम क्यों कांग्रेस की गुलामी करे, क्यों न अपना दल बना लें? और कालान्तर में कुकुरमुत्तों के तरह पार्टियां पैदा होने लगी। आर.जे.डी., सपा, लोजपा, तृणमूल कांग्रेस और न जाने कितने दल बन गए और सफलता भी मिली। उत्तर प्रदेष में सपा और बसपा ने अपनी ज़मीन बढ़ाई। पष्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने कम्यूनिस्टों को उखाड़ फेंका। आज तो जाति और धर्म के नाम दल है। सबमें बाहुबलियों और धनपषुओं का बोलबाला है। इस तरह पूरे समाज के पतन की नींव राजनीतिक आकाओं ने ही डाली है। आज देष में हत्या और बलात्कार की वारदातें बेखौफ़ हो रही है। उसके लिए हमारे राजनीतिक दल पूरी तरह जिम्मेवार है।

शंकालू – मुंषीजी, पिछले कुछ महीनों में साधु-संतों की हत्याओं के अनेक मामले सामने आये है। साधु-संतों को निषाना क्यों बनाया जा रहा है?
मुंशीजी – शंकालू, यह बहुत ही पीड़ादायक स्थिति है। केन्द्र में आज भाजपा के नेतृत्व वाली भारी बहुमत की सरकार है। इसने दूसरे कार्यकाल के एक वर्षों के अंदर जम्मू-कष्मीर से धारा 370 हटाने, तीन तलाक समाप्त करने और राममंदिर विवाद का अदालत से शीेघ्र फैसला करवाने जैसे बड़े कार्य किए हैं। इससे विपक्षी पार्टियों की राजनीतिक जमीन का खिसकता मुख्य कारण है। घटिया राजनीतिक स्वार्थोगं की खातिर कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस, आरजेडी, षिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस और वामपंथी एकजुट होकर हमले करवा रहे हैं। पालघर में साधुओं को पुलिस के सामने भीड़ से मरवाना महाराष्ट्र सरकार की साजिष थी। कार्रवई के नाम पर ध्यान भटकाया जा रहा है। अभी राजस्थान के करौली में एक साधु को जिंदा जला दिया गया। इससे पहले उत्तर प्रदेष में कई साधु मारे जा चुके हैं। घटना के बाद विपक्षी दल राजनीति करते हुए प्रदर्षन में शामिल होते हैं और सरकारें मुआवज़ा राषि घाषित करती है। राजनीति के मकड़जाल में जनता फंसी हुई है। साधु-संतों की हत्या के बाद हिन्दू धर्म के तथाकथित संरक्षक बनने वालों की कलई खुल गई है। विष्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल जैेसे संगठन घृणा फैलाने की राजनीतिक बयानबाजी तो कर सकते हैं। लेकिन साधु-संतों की हत्या करने वालों से बदला लेने के लिए आवाज़ भी निकालने का साहस नहीं करते हैं। इससे यह ज़ाहिर होता है कि ये केवल दंगा की राजनीति के सूत्रधार है।

शंकालू – मुंषीजी, राजनीतिक दल हत्या और बलात्कार के मामलों में पक्षपाती नज़रिया कैसे अपना लेते हैं?
मुंशीजी – शंकालू, देष में सबसे बेहया और बेगैरत कोई है तो वे हैं राजनीतिक पार्टियां। हाथरस काण्ड पर विरोध प्रदर्षन का ड्रामा करने वाली कांग्रेस, राजस्थान और छत्तीसगढ़ मंे हुई ऐसी ही वारदात पर मौन जाती है। राहुल गांधी राजस्थान में साधु के जिन्दा जलाए जाने पर शोक श्रद्धांजलि देने का साहस नहीं कर पाते। इसे ही कहते हैं पतनोन्मुख राजनीति दुराचारिता। ममता बैनर्जी के इषारे पर पष्चिम बंगाल लगातार राजनीतिक हत्याएं हो रही है। हाथरस की घटना पर वे जुलूस निकालती है और अपने राज्य में नेताओं को मरवाने में नहीं शरमाती। भाजपा भी दूध की धूली नहीं है। कुलदीप सिंह सेंगर वाले मामले ने उत्तर प्रदेष पुलिस ने कई महीने बाद रिपार्ट दर्ज की थी। योगी ने सेंगर को बचाने का भरपूर कोषिष की थी। बलात्कार के आरोपी चिन्मयानंद की जमानत मिलने के बाद भाजपा के नेता उनका फूलों से स्वागत करते देखे जा चुके है। राजनीति का आज पूरा वातावरण घिनौना है। आम आदमी इसके लिए बस एक खिलौना है?

शंकालू – मुंषीजी, मौजूदा हालत में वो कौन सा वर्ग है तो अपनी भूमिका सही ढ़ंग से निभा रहा है? और कौन सा वर्ग निष्क्रिया है?
मुंशीजी – समाज को अराजकता की ओर ठकेलने के लिए राजनीति जिम्मेवार है। लेकिन इस दौर में यदि मीडिया नहीं होता तो इन अत्याचारों की जानकारी तक समाज को नहीं मिलती। पालघर काण्ड से लेकर हाथरस और राजस्थान तक की घटनाओं को टीवी चैनलों ने जिस तरह उजागर किया वह काबिले तारीफ़ है। एकाध चैनलों की भूमिक ठीक नहीं रही है। लेकिन कमोबेष अधिकांष चैनल अपना दायित्व ठीक से निभा रहे हैं। इसके द्वारा सामाजिक जागरूकता भी पैदा हो रही है। आज देष का आवाम एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की चाह रखता है जो मौजूदा घटिया राजनीति का विकल्प बने। विपक्ष आज हमाष, बदहवास और छिन्न-भिन्न है। वह केवल अपनी दुकान चलाने के लिए हाथ पैर मार रहा है। भाजपा के नेतृत्व वाला सत्ता पक्ष भी आदर्ष स्वरूप नहीं है। विकल्प न होने पर देष की जनता इन्हें मज़बूरी में समर्थन के लिए बाध्य है। रामराज्य का नारा लगाने वाले राम के शाष्वत मंत्रों को आचरण में नहीं उतार पा रहे हैं। यही कारण है कि समाज में हत्या, बलात्कार और अषांति मौजूदा राजनीति के पर्याय बनते जा रही है। यह बहुत खतरनाक स्थिति है। – दुर्गविजय सिंह ‘दीप’

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