तिरूओणम पर्व व अंडमान में आघोष

डाॅ. मंजू नायर
महादानी, ‘महाबली’ केरल राज्य के राजा थे। प्रजाप्रिय महाबली प्रत्येक दिन अपनी प्रजा को दान दिया करते थे। महादानी, महाबली की ख्याति स्वर्ग लोक तक पहुँची। देवताओं में जब महाबली के दानी स्वभाव की चर्चा हुई तो देवताओं ने सोचा कि अब इनकी ख्याति को कम करना आवश्यक है और इसके लिए विष्णु भगवान को चुना गया, जो वामन रूप में महाबली के समक्ष दान लेने के लिए प्रकट हुए। दान प्राप्त करने पहुँचे और दान में तीन पग भूमि महाबली से मांगी। राजा मान गए। प्रजा के साथ विष्णु भगवान, महाबली के सम्मुख जब पहुँचे तो, देखते ही देखते वामन ने लघु रूप से अपना विशालकाय स्वरूप धारण किया और एक ही पग में संपूर्ण भूमि को नाप लिया, दूसरे पग में आकाश, अब तीसरा पग रखने के लिए उनके पास स्थान नहीं बचा, बली वचनों के पक्के थे। महाबलि ने तुरंत भाप लिया हो न हो यह वामन ईश्वर अवतार है, मेरे साथ कपट हुआ है, फिर भी ईश्वर का अवतार जान, महादानी, महाबलि राजा, विष्णुरूपी महाअवतार के सामने नतमस्तक हुए और उन्होंने कहा, ओ महावामन मैं अपने वचन से पलट नहीं सकता, तीसरा पग आप मेरे सर पर धर दीजिए। महाबलि की नेकदिलेरी व दानी प्रवृत्ति से खुश हो विष्णु भगवान ने उनसे एक वर माँगने को कहा, प्रजास्नेही महाबलि ने प्रत्येक वर्ष एक बार अपने प्रजा की कुशल क्षेम जानने की इच्छा व्यक्त की, फिर क्या था उन्हें वर मिला, महाबलि के सिर पर तीसरा पग पड़ते ही वे पातालभूत हो गए और प्रजाप्रिय राजा प्रत्येक वर्ष, वर्षा ऋतु के पूर्व, ‘पूर्णिमा’ में धन-धान्य एवं ऐश्वर्य सम्पन्न अपने राज्य के वासियों से मिलने आते हैं व महाबलि के आगमन को उल्लासमय बनाने के लिए राज्यवासी, नूतन वस्त्र, फूलों की रंगोली, केले के पत्ते में विविध व्यंजन व पायसम (खीर) के साथ भोजन व मनोरंजन के विभिन्न सौष्ठव संपन्न, कलाओं से राज्य भर को सुशोभित किया जाता है, खुशी का जश्न, संपन्नता का प्रदर्शन, ऐश्वर्य, शांति एवं मानव समाज की एकरूपता दर्शाता, यह पर्व महाबली के राज्य दर्शन को अनूठा, सुसंपन्न व अघोषित रखने का प्रत्यन कर अपने खुशहाली का प्रदर्शन कर महाबली को संतृप्त करने का पर्व है।
यह पर्व वर्षा ऋतु की समाप्ति अर्थात ऋतु परिवर्तन का प्रतीक, फसल कटाई से धन-धान्य संपन्नता का प्रतीक एवं प्रकृति के उल्लास का प्रतीक स्वरूप भी मनाया जाता है क्योंकि धरा, वर्षा जल से शीतल हो उठती है। ऐसी शीतलता में रंग-बिरंगे अनगिनत फूल खिलने मुस्काने लगते हैं। वे वातावरण में महक व सुंदरता बिखरते हैं। वर्षा ऋतु की समाप्ति पर छुपे बैठे, कीट-पतंगे, पक्षी, जीव सभी झूम-झूम कर विचरण करने लगते हैं व घरों में नई फसल की महक से ऐश्वर्य फैलने लगता है। ऐसे मौके पर संपूर्ण प्रकृति हर्षित हो जश्न मनाती प्रतीत होती है। इस समय में महाबलि का आगमन सबको भाता है क्योंकि प्रजा उन्हें खुशहाली का दिग्दर्शन करवा देती है।
इस प्रकार विश्व भर में जहाँ भी केरल वासी निवास करते हैं, वे ओणम का यह त्यौहार अपने प्रिय राजा की ख्याति को अमर रखने के लिए करते हैं क्योंकि पौराणिक गाथाओं में विवेचन है कि परशुराम, रावण, व्यास, बली, नारद एवं हनुमान ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अमरत्व प्राप्त किया जो अपनी मानव जनित मूल्यों से ऊपर उठ कर अपने गुणों में इतने पारंगत हुए कि धरा पर विख्यात हुए व ईश्वरीय अनुकम्पा स्वरूप अमरत्व का वरदान भी प्राप्त किया। जिस कारण हजारों वर्षों से अपनी परंपराओं में समाहित कर भारतीय समाज पर्वों व उत्सवों में माध्यम से उस मानव जनित गुणों का आघोष करता है।
अंडमान द्वीपों में भी पर्वों की अपनी महत्ता है। धर्म जाति के भेदभाव भुलाकर सब एक दूसरे के पर्व में उल्लासित होते हैं, हर्षित हो देश में व्याप्त परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसर पीढ़ी में संचारित करते हैं और मानव मन की संपन्नता व मानवीय गुणों का जश्न मनाते हैं। इस प्रकार सामाजिक न्याय दानप्रियता, प्रजाप्रियता, अहंकार का नाश, मनुष्य को अमरता की लब्धि, प्रकृति की समन्वयता, पूर्णचन्द्र की आभा जैसी प्रचुर शीतलता इत्यादि विशेष सौष्ठवता से परिपूर्ण, पूर्णिमा, दिवस पर यह पर्व, खुशहाली, संपन्नता, ऐश्वर्य, परिपूर्णता, न्याय, समान सामाजिक एकता, मनुष्य के अहंकार विनाशक व प्रकृति की नाजुकता को आघोषित करता मंगलमयी त्यौहार है। जिस काम की शुरूआत, ‘ओम तत् सत् ओम’ से अर्थात् पंच भूत के सभी तत्व उसमें सम्मिलित है और उसी के आधार पर ओम को नम् करते ओणम पर्व की शुरूआत को जोड़ा जाता है, क्योंकि दानी राजा बली प्रजा स्नेही था जिसकी चाह इस दिन पूरी होती है क्योंकि फूलों की रंगोली सजती है, उनके स्वागत में करीब दस दिन यह उत्सव मनाया जाता है। शाकाहारी भोजन व केले का पत्ता प्राकृतिक संरक्षण व उसकी गतिशीलता व जीवन चक्र का प्रतीकतुल्य है। दानप्रियता, संपन्नता व ऐश्वर्य का प्रतीक बनाता है और मनुष्य के सुकर्म, अमरत्व का मार्गप्रशस्त करता है, इसका सुखद अनुभव व अनुपम उदाहरण भी इसको प्रतीकात्मक बनाता है।
द्वीपों में प्रत्येक मलयाली परिवार, संगठन एवं केरला समाज, प्रत्येक द्वीपवासी, जो नन्हें हरे-भरे द्वीपों में बसते हैं, खुशहाली की कामना करते हैं, मलयालम भाषा व त्यौहार के मूल भाव को जश्न द्वारा उजागर करते हैं। पारंपरिक दीयों को रोशन किया जाता है, फूलों की रंगोली सजायी जाती है, नूतन वस्त्र पहने जाते हैं और मिष्ठान व पकवान, पायसम इत्यादि वितरित कर महाबली के सत्कार में जश्न मनाया जाता है। त्यौहार को परिवार जनों व सगे संबंधियों से दूर होते हुए भी अपने आस-पास आबाद, सभी जनों को शामिल कर खुशी का इजहार करते हैं आघोषित करते। भारतीय त्यौहारों के रंगों, दीयों, रंगोलियों नूतन परिधान व ऋतु के अनुरूप भोजन, प्रकृति की प्रचुरता देश की विशालता व परंपराओं की अगाधता को पुष्ट करता चलता है।
साभार-द्वीप संजीवनी

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