हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को लेकर इतना हंगामा क्यो है मचा, क्या है यह?

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन नाम इन दिनों बहुत ही चर्चा में है। यह मलेरिया के इलाज में काम आने वाली एक दवा है।अब इस दवा का उपयोग कोरोना के इलाज में भी किया जा रहा है।हालांकि यह दवा कोरोना के इलाज में कितनी कारगर है यह अभी तक ठीक से कहा नहीं जा सकता।लेकिन महामारी से बढ़ते मौत के तांडव ने पूरी दुनिया को इस स्थिति में ला दिया है कि जहां कहीं भी थोड़ी-सी आशा की किरण दिखती है, हम उसकी संभावना तलाशने में लग जाते हैं।
गौरतलब है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन दशकों से मलेरिया के इलाज की एक निर्धारित दवा है। इसका इस्तेमाल रूमटॉइड आर्थ्राइटिस तथा ल्यूपस (त्वचा पर निकलने वाला एक क्रॉनिक तथा उभरा हुआ घाव) जैसे ऑटोइम्यून रोगों के इलाज के लिए भी होता है।
एक प्रयोगशाला अध्ययन में पाया गया कि क्लोरोक्विन कोरोना वायरस को कोशिकाओं पर हमले से रोकता है। हालांकि टेस्ट ट्यूब या पेट्री डिसेस में जो दवा वायरस पर काबू पाते हैं, वैसा मानव शरीर में हमेशा नहीं होता है। साथ ही यह पाया गया है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन इंफ्लूएंजा तथा अन्य वायरल रोगों को रोकने या उनके इलाज में सफल नहीं है। लेकिन चीन और फ्रांस के डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन कभी-कभी एंटीबॉयोटिक एजिथ्रोमाइसिन के साथ दिए जाने से रोगियों को राहत मिलती दिखती है। परंतु यह अध्ययन छोटे पैमाने पर हुआ। इसलिए व्यापक पैमाने पर यह पता नहीं चल पाया कि दवा ने काम किया या नहीं। फ्रांसीसी अध्ययन को इस आधार पर नकार दिया गया कि यह मानकों को पूरा करने वाला नहीं था।
चीन के एक हालिया अध्ययन (जिसमें कंट्रोल ग्रुप को शामिल किया गया) से यह बात बताई गई कि कोरोना के हल्के मामले में रोगियों के इलाज में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन से मदद मिल सकती है। लेकिन यह अध्ययन भी सीमित पैमाने पर हुआ, जिसमें कुल 62 रोगी ही थे और उन्हें अन्य दवाएं भी दी गईं।
शोधकर्ता खुद भी कहते हैं कि इस संबंध में और भी अध्ययन की जरूरत है। कोरोना रोगियों में इम्यून सिस्टम काफी सक्रिय हो जाता है, जिससे सूजन/जलन पैदा होने के साथ ही फेफड़ा और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा होता है। जबकि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को अति सक्रिय इम्यून सिस्टम पर काबू पाने वाला माना जाता है। डॉक्टर उम्मीद करते हैं कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन इस स्थिति को शांत करता है। लेकिन क्या यह वाकई काम करता है, इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है।
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन कोरोना वायरस के संक्रमण से बचा सकता है। हालांकि यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के शोधकर्ता कोरोना के रोगियों के साथ रहने वाले लोगों पर इस दवा का असर परखने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह उन्हें संक्रमण से बचा सकता है।
कोरोना का अभी तक कोई सिद्ध उपचार नहीं होने से कई अस्पताल इस उम्मीद में रोगियों को यह दवा देने लगे हैं कि इससे मदद मिल सकती है। दुनिया भर में नियंत्रित समूह पर इस दवा का क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो चुका है। अमेरिका में 2 अप्रैल को राष्ट्रीय स्तर पर इसका ट्रायल शुरू हुआ, जिसके लिए 44 मेडिकल सेंटरों पर 510 रोगियों का नाम दर्ज किया गया है। अध्ययन से पता चलेगा कि यह दवा कोरोना वायरस के खिलाफ काम करती है या नहीं। यदि इसे असरकारी नहीं पाया गया तो संसाधनों का इस्तेमाल अन्य संभावित इलाज खोजने में किया जाएगा।
सभी दवाओं की तरह इसके भी दुष्प्रभाव हो सकते हैं। यह दिल, रेटिना संबंधी आंख की समस्या, लिवर और किडनी के रोगों से ग्रस्त लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है। इसके अलावा जी मिचलाना, डायरिया, मनोदशा में बदलाव तथा त्वचा पर चकते जैसे दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। ह्रदय रोग विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन तथा एजिथ्रोमाइसिन दिल के काम में खतरनाक व्यवधान पैदा कर सकती हैं। कुल मिलाकर माना जाता है कि जिन लोगों में ऐसी बीमारियां नहीं हैं, उनके लिए अपेक्षाकृत यह सुरक्षित है। लेकिन यह पता नहीं है कि क्या कोविड-19 के गंभीर बीमारों के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन सुरक्षित है या नहीं।

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