मीडिया में अवमूल्यन

मीडिया को भारतीय लोकतंत्र का चैथ स्तंभ कहा जाता है। इसमें सच्चाई भी है। जिस राजनीति के ज़रिये हमारी शासन व्यवस्था संचालित होते है उसमें खामियों और चूक की गुंजाइष रहती है। इसी कारण प्रेस को ‘वाॅच डाॅग‘ यानी निगरानीकर्ता कहा जाता है। पिछले 70 साल के दौरान हमारे प्रिंट मीडिया ने कई बार अपनी कारगर भूमिका निभाई जिसके चलते सरकारों को जाना पड़ा। इससे यह प्रमाणित हो गया कि यदि सजग मीडिया नहीं होता तो शासन निरंकुषता का पर्याय बन जाता है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में स्वतंत्र प्रेस यानी मीडिया शासन की आंखों में खटकता है। कई देषों में तो प्रेस का गलाघोंटा जा चुका है। चीन, पाकिस्तान जैसे देष इसके प्रमाण है। हमारे देष में इलेक्ट्रिोनिक मीडिया के आने के बाद सूचना क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ। पूरा विष्व सूचना की दृष्टि से गांव में बदल गया। एक के बाद एक समाचार चैनलों ने जन्म लिया। टी.वी.चैनलों के आने के बाद घोर व्यवसायिकता ने जन्म लिया और पर्दे के पीछे से धर्नाजन की लिप्सा का ऐसा गंदा खेल शुरू हुआ जिसमें गलाकाट प्रतियोगिता को जन्म दिया। राजनीतिक विचारधाराओं और कट्टर धार्मिकता तथा विघटनकारी प्रवृत्तियों के प्रभाव से हमारे चैनल अछूते नहीं रह सके। इन्होंने अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए पत्रकारिता की सिद्धांतों के साथ समझौता शुरू कर दिया और शुरू गया मीडिया में अवमूल्यन का दौर। पिछले 10 वर्षों में तो मीडिया ने पतन के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए। अनके चैनल समाचार बुलेटिनों में बेषर्मी से घोषणा करते रहे कि वे सबसे तेज़ है। वे ही नम्बर एक है। यदि सारे चैनल यही राग अलापते है तो इससे स्पष्ट हो जाता है कि ज्यादातर चैनल झूठ बोल रहे हैं। यदि कोई चैनल राष्ट्रवादी भावना और आध्यात्मिक चेतना के पक्ष में ख़बरें दिखा देता है तो दूसरे चैनल उसकी काट के लिए विघटनकारी, प्रवृत्ति और मूल्यहीनता के पक्ष में खड़े हो जाते है। पालघर में जब साधुओं की निर्मम हत्या पुलिस की मौजूदगी में हुई तो रिपब्लिक भारत ने सच्चाई का खुलासा किया। दूसरी ओर कई चैनल मौन रहे। सुषांत मौत मामले में तो मीडिया की गलाकाट प्रतियोगिता बेषर्मी की हद तक पहुंच गई। रिपब्लिक भारत ने अभियान चलाकर जब पीडित का पक्ष लिया तो आज तक ने मुख्य आरोपी रिया चक्रवर्ती का ऐसा साक्षात्कार प्रसारित किया जो पत्रकारिता के मूल्यों की हत्या करता है। रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी के बाद इन्टरव्यू में किए गए दावे हवा हो गए। आज तक की टी.आर.पी. औंधे मुंह गिरी। इसके बाद हाथरस की घटना में भी कुछ चैनलों ने प्रतियोगी ख़बरेें देकर माहौल बिगाड़ने की कोषिष की। जो खुलासा अब हो रहा है उससे पता चलता है कि कई टीवी चैनल स्वार्थ के लिए किसी हद तक गिर सकते हैक्ं। इन दिनों टी.आर.पी. काण्ड ज़ोरों पर है। हंसल की रिपोर्ट में आज तक पर रिष्वत देने का आरोप है, लेकिन मुंबई पुलिस ने बेषर्मी से प्रेस कांफ्रेंस में रिपब्लिक भारत का नाम लिया। अब सच्चाई जब सामने आई है तो ‘आजतक’ और महाराष्ट्र शासन की बोलती बंद है। टीवी चैनल आज कल कई धड़ों में बंट गए है। एक धड़ा इन चैनलों का है जो अपने घटिया स्वार्थों के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग, विघटनकारी शक्तियों और देषद्रोही कट्टरपंथियों के साथ है। एक धड़ा राष्ट्रवादी भावना के साथ जुड़ा है तो कुछ चैनल निष्पक्ष भी हैं। लेकिन इस रस्साकषी में कुछ टीवी चैनल चलाने वाले मालिकों की घृणित सोच सामने आ गई है। चैनलों का अवमूल्यन जारी है। यह हमारे लोकतंत्र के लिए अषुभ है। इसके लिए राजनीति भी जिम्मेवार है। सत्ताधारी सदा अपने पक्ष में समाचार चाहते है तो प्रतिपक्षी हमेषा समाज में अस्थिरता फैलाने की ताक में रहते हैं। दोनों ही प्रवृत्तियां घातक है। सही और जनकल्याणकारी नीति कार्यक्रमों की तारीफ़ के साथ क्रियान्वयन में हुई चूक और खामियों को भी दिखाया जाना चाहिए। स्वस्थ्य आलोचना और प्रषंसा उचित है, लेकिन एजेंडा चलाना मीडिया धर्म के विरूद्ध है। आज स्थिति बदत्तर होती जा रही है। मौजूदा राजनीति खेल से प्रभावित मीडिया का अवमूल्यन कहां जाकर रूकेगा, फिलहाल कुछ कहना मुष्किल है।

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