धर्म और षिक्षा

हमारी भारतीय संस्कृति सनातन पद्धति की देन है। पूरी दुनिया में जब मानव सभ्यता का स्वरूप विकसित हुआ तो सबसे पहले आध्यात्मिक चेतना का सूत्रपात भारत भूमि से हुआ। हमारे ऋषि-महर्षि अपने समय के ऐसे वैज्ञानिक थे जिनकी कार्य पद्धति, आध्यात्म पर आधारित थी। आध्यात्मिक साधना, तप और कर्मयोग से हमारे ऋषियों ने ईष्वरी शक्ति का अनुभव प्राप्त कर सनातन धर्म की अवधारणा को मूर्त रूप दिया। यही कारण है कि दुनिया में बाद में मे जितने भी धर्म और मज़हब हुए उनमें कल्याणकारी तत्व वैसे ही हैं जैसा सनातन पद्धति में है। समय-समय पर नए पंथ और मज़हब के आने के पीछे यही उद्देष्य रहा है कि प्रचलित धर्म के पालन में आयी विकृतियों और पाखण्डों से मानव को निजात दिलाई जा सके। मानव जीवन को खुषहाल बनाने के लिए ही ईष्वरी प्रेरणा से पैगम्बरों ने नये धर्मों को जन्म दिया। पैगम्बर मोहम्मद ने पाक कुरान में ईष्वर की वाणी को प्रतिस्थापित किया। धर्म के क्षेत्र में यह बड़ी क्रांति थी। कुरान में मानव कल्याण के वे तत्व मौजूद है जो वेदों और उपनिषद में हैं। इस्लाम की मूल अवधारणा एक ईष्वरवाद की है, जो निराकार है। हमारी सनातन संस्कृति में वास्तव में ब्रम्ह निराकर ही है। लेकिन उस निराकर ब्रम्ह को साकार के रूप में भी स्तुति होती है। जिस रूप में एक सच्चा भक्त या साधक निराकार के प्रति आस्था रखकर साधना करता है उसी रूप उसे ईष्वरीय सत्ता की अनुभूति होती है। लेकिन साकार स्वरूप में प्रचलित पूजा पद्धति मंे विकृति पैदा होने की संभावना बनी रहती है। आज यह सर्वत्र देखेन को मिलती है। धर्म को व्यावसायिकता और जीविकापर्जन से जोड़ देने के कारण इस में पाखण्ड का समावेष किसी न किसी स्तर पर अवष्य है। वास्तव में इसके लिए धर्म या आध्यात्म दोषी नहीं है। दोष अनुयायियों का है। धर्म और आस्था के नाम पर गलत रास्ते अपनाने का खामियाज़ा मनुष्य स्वयं भुगतता है। धर्मग्रंथा को समझने के लिए षिक्षा भी ज़रूरी है। षिक्षा का क्षेत्र व्यापक है। भौतिक सुखों और उपलब्धियों के लिए यदि षिक्षा ज़रूरी है तो धर्म और आध्यात्म के ज्ञान के लिए भी षिक्षा पहली आवष्यकता है। जब धर्म और आध्यात्म के अध्ययन के लिए षिक्षा का सहारा लिया जाता है तो उसक धार्मिक षिक्षा का नाम दिया जाता है। षिक्षा या ज्ञान अपने आप में निरपेक्ष है। उसके उद्देष्य और अभीष्ट के आधार पर कोई भी नामकरण हो सकता है। पूरी दुनिया में वैज्ञानिक षिक्षा और भौतिकवादी ज़रूरतों से जुड़ी षिक्षा का बोलबाला है। मंदिर, मसजिद या गिरजाघर तथा गुरूद्वारे में आराधना और साधना के साथ यदि लोगों को धार्मिक षिक्षा दी जाती है तो कोई बुराई नहीं। लेकिन जब किसी धर्म विषेष द्वारा युवाओं केवल धार्मिक कट्टरता की घुट्टी पिलाने के लिए स्कूल चलाए जाते हैं तो उससे धार्मिक सहिष्णुता के बजाय विघटनकारी प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। हमारे देष में हजारों की संख्या में मदरसे संचालित है। अच्छी बात है। इस्लमा और कुरान की षिक्षा देना उचित है। लेकिन पिछले एक दषक के दौरान पकड़े और मारे गए अधिकांष आतंकी इन्हीं मदरसों की उपज थे। मदरसों में धार्मिक षिक्षा के साथ आधुनिक षिक्षा का समावेष होना चाहिए। ईसाई मिषनरी की ओर से संचालित स्कूल आज इसलिए सफल है, क्यांेकि वहां आधुनिक षिक्षा मूल विषय है। इसके साथ ईसाई धर्म की भी षिक्षा दी जाती है। असम के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य में मदरसों को दी जाने वाली सरकारी आर्थिक मदद बंद करने की घोषणा की है। उनका कहना है कि राज्य के खर्च पर कुरान की षिक्षा देने की व्यवस्था पक्षपाती है। क्योंकि गीता या बाइबिल पढ़ाने के लिए ऐसे संस्थान संचालित नहीं है। मुख्यमंत्री ने तो संस्कृत विद्यालयों को भी बंद करने का फरमान जारी किया है। असम सरकार का यह फैसला पूरी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। गीता, कुरान या बाइबल की षिक्षा देना कोई पाप नहीं है। आध्यात्मिक षिक्षा के प्रति उदासीनता का दुष्परिणाम सामने हैं। मानवीय संवदेनषून्यता और असहिष्णुता का मुख्य कारण आध्यात्मिक षिक्षा का अभाव ही है। असम के मुख्यमंत्री को विषेषज्ञों के साथ मनन-चिंतन के आधार पर ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिससे आधुनिक षिक्षा और धार्मिक षिक्षा दोनों के लिए उचित व्यवस्था हो। संस्कृत भाषा कोई धार्मिक गं्रथ नहीं है। संस्कृत या उर्दू के संस्थानों को बंद करना शासन की मूर्खता ही कहा जायेगा। फिलहाल असम सरकार के फैसले की आलोचना हो रही है। सरकार को चाहिए कि वह इस मामले का सही हल निकाले और ऐसी व्यवस्था करें जिससे मदरसे बंद न हो और न ही संस्कृत स्कूल। इनमें आधुनिक षिक्षा का समावेष कर इन स्कूलों को प्रोन्नत करना उचित होगा।(दुर्ग विजय सिंह दीप)

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